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Showing posts from December, 2025

अब मेरा अपना आसामां होगा

सफ़र की शुरुआत का कोई निशान नहीं होता, बस चल पड़ते हैं कदम, जब कोई अरमान नहीं होता। अब तक तो औरों के ही नक्शे-कदम पे चलते रहे, हालात की धूप में, मोम की तरह पिघलते रहे। वो राहें अपनी न थीं, जिन पर ज़िंदगी गुज़ार दी, औरों की पसंद पे ही, अपनी हर खुशी वार दी। याद आता है वो बचपन, वो दादी का आँचल, जहाँ हर गम का हल था, वो प्यार भरा आँचल। ज़रा सा रो देना और फिर गन्ने की वो मिठास, जैसे हर मर्ज़ की दवा थी, नानी के पास। मगर अब वो मासूमियत नहीं, न ही वो सहारा है, ये समंदर गहरा है, और तन्हा ही किनारा है। फर्ज़ के सारे कर्ज़ अब, अदा हो चुके हैं, पाँव की बेड़ियाँ कटीं, हम आज़ाद हो चुके हैं। अब मुड़ना है किधर, ये फैसला मेरा अपना होगा, जो देखूँगा जागती आँखों से, वो मेरा सपना होगा। दाएँ, बाएँ या सीधा—मंज़िल अब खुद चुननी है, अपनी ही खामोशियों से, एक नई धुन बुननी है। सुनहरी किरणों ने आज, चेहरे पे दस्तक दी है, बीते कल की धुंध ने, अब विदाई ली है। दरवाज़े के पार देखो, पत्तों का वो झूमता मंज़र, जैसे खत लिख रही हो हवा, एक नए सफ़र पर। मैं तैयार हूँ अब, हर अनजानी डगर के लिए, निकल पड़ा हूँ मैं, अपने खुद के सफ़र के लिए।