धड़कन का अफ़साना पड़ गए थे बादल पवई पर , भीगी थी हर इक रहगुज़र , क्लासों से लौटे हम भी , दिल में थी इक मीठी ख़ुशबू भर। होस्टल की सीढ़ी पर चलते , चिट्ठी की आहट साथ चली , नागपुर से आया था पैग़ाम , आँखों में इक बिजली खिली। काग़ज़ पर लिखे थे अल्फ़ाज़ , सुनहरी सी किस्मत का रंग , पहला नंबर , गोल्ड मेडल था , दिल में उठी गर्व की तरंग। दोस्तों की भीड़ ने घेरा , शोर हुआ ताली-सा चारों ओर , सोचा ये सब माँ के नाम है , जिनके सपनों ने दिया था ज़ोर। जेब में थे बस थोड़े से साधन , पर सपनों की थी भरमार , बॉम्बे से चलती उस ट्रेन ने , नागपुर का भी कर रखा था ख़याल। थोड़ा-सा सामान था साथ , बाँध के रखा था इक बैग में , सोचा , घर के आँगन में जाकर , बाँटूँगा ये खुशियाँ सबके संग में। याद आई माँ की थकन , उनकी चुप उम्मीदों की छाँव , हर इक जगे जगे में बस था , उनका चेहरा , उनकी दुआओं का गाँव। जल्दी में चिट्ठी भी लिख डाली , हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट के लिए , ज़िंदगी कितनी तेज़ भागती है , फिर भी रुकती माँ की लिए। नागपुर की शाम ने घेरा , घर की खुशबू , पुरानी गली , मौसी जी ने इशारों इशारों में , न...